Tuesday, September 21, 2010

अब मेरी बारी है !

बीते हुए पलों में,
सिमटी यादों का अहसास,
टूट रहे कदम
लेकिन उम्मीदों का आभास,
आज भी मुझे रोकता है,
आज भी मुझे झकझोरता है,
गंभीर समस्या,
टूटता हौसला,
मैं बिलकुल अकेला
और दूर काफिला,
लेकिन,
उम्मीद फिर भी जिन्दा,
बिगड़ता मौसम
और लड़खड़ाता परिंदा,
बचा ही क्या,
जो खो दूंगा?
जंग से वापस,
क्यूँ लौटूंगा?
हाँ..जिद्दी हूँ मैं,
समस्याओं के आगे
पिद्दी हूँ मैं,
लेकिन,
कुछ भी नहीं खोने को,
अरुण का आगोश
समय नहीं सोने को,
मैं क्यूँ हार मान जाऊं?
आसानी से मिला ही क्या,
जो जंग मैं छोड़ जाऊं ?
मैं अब डरूँ ही क्यूँ?
चुप मैं रहूँ ही क्यूँ?
कोशिश से पीछे,
मैं हटूँ ही क्यूँ ?
.
.
अब मेरी बारी है,
किस्मत से नहीं है नाता,
जीत का अधिकार
निश्चित, श्रम है लाता,
श्रमी ही, जीत का अधिकारी है
अब मेरी बारी है !

No comments:

Post a Comment