सुबह में दिखता चाँद
न जाने क्यूँ अक्सर रोता है
संभव है रात की मायूसी या
खोने पर अपनों के रोता है?
शाम को जिसकी सुन्दरता
प्रेमी के शब्द-श्रृंगार बने
वही मगर किरणों के संग
बिरहा मन क्यूँ विक्षोब सहे?
है अटकल तो सबके ही मन में
कारण जाने क्या-क्या होगा
है संभव प्रेमी छोड़ गया
है संभव मन मायूस ही होगा |
पर कारण हम कितने भी गढ़ लें
दर्द भला कब कम होता है?
सुबह उठा जब दुनिया सारी
सुबक सुबक चंदा रोता है |
इन्सां गन्दी फितरत वाले
निज स्वार्थ टिके जिन प्रेम के प्याले
हर शाम ही जिसने प्रेम परोसा
सुबह चाँद, वही प्रेम तलासे |
लेकिन तू चाँद, निराश ना होना
हम तुच्छ तुझे क्या समझायेंगे?
सौ प्रेम भले ही संभव हो पर
हर शाम तुझे ही अपनाएंगे !
wah wah badhiya hai!
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