उठते ही
अफ़सोस से घिरा हूँ
न आंवला का पेड़
न अरहुल की
मुस्कुराती कलियाँ
न बैलों के
गले की घंटियां
और न ही
नीला आसमां
उठते ही
गिर पड़ा हूँ
अफ़सोस से घिरा हूँ !
न भरोसा रहा
कि रोना
अगाध प्रेम दिलाये
कि खोना
ढूंढती नजरों से
परिचय कराये
अनमने मन से
रजाई में छुपते
अठखेलियां करते
भूलते बिसरते
यादें
बातें
और
वो अहसास
आह.. उठते ही
गिर पड़ा हूँ
अफ़सोस से घिरा हूँ !
बेतहाश
बेताब
ये कैसी जिंदगी ?
क्या मंजिल ?
क्या मंजर ?
बस दो पल
हाँ
दो वो पल
जब
यादों की गलियों में
खुद को छुपा लूँ
गाहे बगाहे
वो पन्ने फरफरा लूँ
और ,
मैं जिल्द लगा लूँ
मैं जिल्द लगा लूँ
जिंदगी के
नाजुक, निश्चल, नन्हीं
यादों को संजो लूँ
जिल्द लगा लूँ
हाँ, मैं जिल्द लगा लूँ !
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